बिग ब्रेकिंग–अब सिर्फ वादे नहीं, बिंदुखत्ता को चाहिए अधिकार, तीसरे दिन भी अनशन जारी, लालकुआं में उमड़ा जनसैलाब…

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उत्तराखंड/बिंदुखत्ता। लालकुआं की सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब किसी सामान्य विरोध का संकेत नहीं, बल्कि दशकों से अधूरी पड़ी एक बड़ी मांग की गूंज है। बिंदुखत्ता को राजस्व ग्राम घोषित करने की मांग को लेकर तीसरे दिन भी क्रमिक अनशन जारी है, जिसमें अब जनसमर्थन लगातार बढ़ता जा रहा है।

 

 

 

करीब 90 हजार की आबादी वाला बिंदुखत्ता वर्षों से अपनी प्रशासनिक पहचान के लिए संघर्ष कर रहा है। चुनावी मंचों पर बार-बार उठने वाला यह मुद्दा हर बार वादों तक सीमित रह गया। लेकिन इस बार जनता का धैर्य जवाब देता नजर आ रहा है। सड़कों पर उतरी भीड़ केवल संख्या नहीं, बल्कि टूटे भरोसे और अधूरी उम्मीदों की आवाज है।

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स्थानीय लोगों का कहना है कि राजस्व ग्राम का दर्जा न मिलने के कारण उन्हें जमीन के कागजात, भवन निर्माण की अनुमति, सरकारी योजनाओं का लाभ और बैंक ऋण जैसी मूलभूत सुविधाओं में लगातार बाधाओं का सामना करना पड़ता है। युवा रोजगार और बुनियादी ढांचे की मांग कर रहे हैं, वहीं महिलाएं स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं की कमी पर सवाल उठा रही हैं।

 

 

 

इस जनआंदोलन में कई स्थानीय लोग सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं, जिनमें प्रमुख रूप से एडवोकेट तरुण जोशी, पूर्व मंत्री हरीश चंद्र दुर्गापाल, पूर्व विधायक नवीन दुमका, हरेंद्र बोरा, नंदन दुर्गापाल, उमेश भट्ट, खिलाफ सिंह दानू, मोहन कुड़ाई, बलवंत बिष्ट, के0 प्रताप बिष्ट, नंदन बोरा, दीपक जोशी, दीपक नेगी, ललित कांडपाल, पूर्ण परिहार, खीम सिंह कार्की, प्रकाश उत्तराखंडी, विक्की पाठक, पुष्कर दानू, हीरा सिंह बिष्ट,

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चन्द्र सिंह दानू, भानु कांडपाल, उर्मिला धामी, दीपा बिष्ट, ममता बिष्ट, बलवंत सम्भल, अर्जुन नाथ गोस्वामी, प्रमोद कॉलोनी, बीना जोशी, शेखर जोशी, भरत नेगी, गोपाल सिंह नेगी, भगवान सिंह धामी, बलवंत सिंह, संध्या डाला कोटी, वीरेंद्र दानू, पुष्कर दानू, भूतपूर्व सैनिक प्रकाश मिश्रा, प्रकाश उत्तराखंडी, गौलापार से अर्जुन बिष्ट, हेमंत बगड़वाल, नन्दन बिष्ट समेत हजारों बिंदुखत्ता वासी शामिल हैं। इनके साथ दर्जनों अन्य लोग भी इस लड़ाई को मजबूत बना रहे हैं।

 

 

 

लालकुआं में उमड़ी यह भीड़ साफ संकेत दे रही है कि अब जनता सिर्फ आश्वासन सुनने को तैयार नहीं है। यह आंदोलन किसी एक दल या व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि उस राजनीतिक सोच के खिलाफ है जो जनता की समस्याओं को चुनावी मुद्दा बनाकर भूल जाती है।

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यह जनसैलाब एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी देता है, यदि जनभावनाओं को नजरअंदाज किया गया, तो इसका असर सिर्फ एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले समय में यही जनता सत्ता की दिशा तय करने की क्षमता रखती है।

 

 

 

लालकुआं की यह तस्वीर साफ कर रही है कि अब बिंदुखत्ता के लोग भाषण नहीं, समाधान चाहते हैं। अगर समय रहते निर्णय नहीं लिया गया, तो यह आंदोलन सिर्फ एक मांग नहीं, बल्कि बदलाव की शुरुआत बन सकता है।

 

 

 

 

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