लालकुआं में गूंजा जन सैलाब:–बिंदुखत्ता को राजस्व ग्राम बनाने की मांग ने पकड़ा जोर…

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लालकुआं–लालकुआं की सड़कों पर उमड़ी भीड़ सिर्फ एक सामान्य प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि वर्षों से अधूरी पड़ी मांग की तेज होती गूंज थी। यह गूंज थी बिंदुखत्ता को राजस्व ग्राम घोषित करने की, एक ऐसी मांग जो दशकों से राजनीतिक मंचों पर सुनाई देती रही, लेकिन जमीनी हकीकत में अब तक नहीं उतर सकी।

 

 

 

स्थानीय लोगों का कहना है कि राजस्व ग्राम का दर्जा मिलने से बिंदुखत्ता को स्पष्ट प्रशासनिक पहचान मिलेगी। इससे सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ, भूमि संबंधी अधिकारों की वैधानिक सुरक्षा, निर्माण कार्यों की स्वीकृति में आसानी और बैंक ऋण जैसी सुविधाओं का रास्ता साफ होगा। वर्तमान में इन सभी मामलों में लोगों को लगातार दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

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प्रदर्शन में शामिल युवाओं ने रोजगार और बेहतर बुनियादी ढांचे की मांग उठाई। महिलाओं ने स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा सुविधाओं की कमी पर सवाल खड़े किए, जबकि बुजुर्गों ने वर्षों से लंबित फाइलों और अधूरे वादों की पीड़ा साझा की। उनका कहना है कि हर चुनाव से पहले राजस्व ग्राम का मुद्दा जोर पकड़ता है, लेकिन चुनाव खत्म होते ही मामला फिर ठंडे बस्ते में चला जाता है।

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लालकुआं में जुटी भीड़ की नाराजगी किसी एक दल या व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति के खिलाफ है जिसमें जनता की उम्मीदें चुनावी घोषणाओं तक सीमित रह जाती हैं। प्रदर्शनकारियों का साफ कहना है कि अब उन्हें आश्वासन नहीं, ठोस निर्णय चाहिए।

 

 

 

अब सबकी नजरें सरकार और जनप्रतिनिधियों पर टिकी हैं। क्या यह जनसैलाब एक और वादा सुनकर शांत हो जाएगा, या यह आंदोलन निर्णायक मोड़ लेगा? लोकतंत्र में जनता की आवाज ही सर्वोपरि होती है। यदि इस बार भी मांग को अनसुना किया गया, तो इसका असर केवल बिंदुखत्ता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि व्यापक राजनीतिक संदेश बन सकता है।

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लालकुआं की सड़कों से उठी यह आवाज स्पष्ट संकेत दे रही है अब जनता भाषणों से नहीं, अपने अधिकारों से संतुष्ट होगी।

 

 

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