जंगल से जनबस्ती तक बिंदुखत्ता की ऐतिहासिक यात्रा, अब राजस्व ग्राम के अधिकार की निर्णायक लड़ाई, सातवें दिन भी जारी रही पदयात्रा, महिलाओं की बड़ी भागीदारी ने आंदोलन में भरी नई ऊर्जा…

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बिंदुखत्ता/लालकुआं। राजस्व ग्राम के दर्जे की मांग को लेकर बिंदुखत्ता में चल रही पदयात्रा अब महज एक आंदोलन नहीं, बल्कि दशकों पुराने अधिकार संघर्ष की आवाज बनती जा रही है। शुक्रवार को पदयात्रा के सातवें दिन सैकड़ों महिलाओं, पुरुषों, युवाओं और बुजुर्गों ने भीषण गर्मी के बावजूद पूरे उत्साह के साथ भाग लिया। सरस्वती माता मंदिर, प्राइमरी पाठशाला काररोड़ से शुरू हुई पदयात्रा मुख्य बाजार, बोरा लाइन, बोरिंग पट्टा और राजीवनगर होते हुए प्राचीन शिव मंदिर काररोड़ पहुंची, जहां दिन की पदयात्रा का विराम हुआ।

 

पदयात्रा के दौरान जगह-जगह ग्रामीणों ने अभियान का स्वागत करते हुए अपना समर्थन दिया। लोगों ने एक स्वर में कहा कि “बिंदुखत्ता को राजस्व ग्राम बनाना होगा, अपना अधिकार मांगते रहना होगा।” ग्रामीणों ने कहा कि यह मांग किसी एक राजनीतिक दल या संगठन की नहीं, बल्कि बिंदुखत्ता की आने वाली पीढ़ियों के भविष्य और अधिकारों से जुड़ा सवाल है।

 

बिंदुखत्ता का इतिहास जंगल और पहाड़ से मैदान की ओर हुए पलायन तथा संघर्ष की कहानी से जुड़ा है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार बिंदुखत्ता क्षेत्र में वन भूमि पर बसावट की शुरुआत करीब 1932 से मानी जाती है। शुरुआती दौर में पर्वतीय क्षेत्रों के लोग सर्दियों में तराई की ओर आते थे और यहां खेती, पशुपालन तथा श्रम के सहारे जीवन यापन करते थे। धीरे-धीरे लोगों ने जंगल साफ कर रहने और खेती योग्य जमीन विकसित की और छोटी-छोटी बस्तियां आकार लेने लगीं।

 

समय के साथ यही बस्तियां फैलती गईं और बिंदुखत्ता एक विशाल आबादी वाले क्षेत्र के रूप में विकसित हुआ। आज यहां सड़क, बिजली, पानी, स्कूल, बाजार और अन्य मूलभूत सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन भूमि के अधिकार और प्रशासनिक पहचान का सवाल अभी भी पूरी तरह हल नहीं हो पाया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार करीब 3,470 हेक्टेयर वन भूमि पर बसा यह क्षेत्र वर्ष 2011 की जनगणना में 56,130 की आबादी दर्ज कर चुका था और बाद के वर्षों में इसकी आबादी करीब 65 हजार तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया।

 

बिंदुखत्ता को राजस्व ग्राम का दर्जा दिलाने की मांग नई नहीं है। इसके लिए ग्रामीण लंबे समय से आंदोलन करते आ रहे हैं। विभिन्न रिपोर्टों में इस संघर्ष की शुरुआत 1970 के दशक से बताई गई है, जबकि 1985 से राजस्व ग्राम के दर्जे की मांग लगातार उठने का उल्लेख भी मिलता है।

राजस्व ग्राम का दर्जा नहीं होने के कारण भूमि स्वामित्व, राजस्व अभिलेख, परिवार रजिस्टर और स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक अधिकारों से जुड़ी कई समस्याएं ग्रामीणों के सामने रही हैं। यही वजह है कि बिंदुखत्ता में समय-समय पर धरना, प्रदर्शन, महापंचायत, पदयात्रा और जनआंदोलन होते रहे हैं।

 

वर्ष 2014 में राजस्व ग्राम के बजाय बिंदुखत्ता को नगरपालिका बनाने की दिशा में कदम उठाया गया था, जिसका स्थानीय लोगों ने विरोध किया। इसके बाद आंदोलन और तेज हुआ। 2015 में लालकुआं में बड़ी महापंचायत भी हुई, जिसमें ग्रामीणों ने राजस्व ग्राम की मांग को प्रमुखता से उठाया।

 

वन अधिकार अधिनियम, 2006 लागू होने के बाद बिंदुखत्ता के ग्रामीणों को अपने लंबे संघर्ष को कानूनी आधार मिलने की उम्मीद जगी। इसी कानून के तहत राजस्व ग्राम की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए वन अधिकार समितियों ने दावे और दस्तावेज तैयार किए।

 

19 जून 2024 को जिला स्तरीय वन अधिकार समिति से बिंदुखत्ता के सामूहिक दावे को स्वीकृति मिलने के बाद मामला शासन को भेजे जाने की जानकारी सामने आई थी। इससे ग्रामीणों में उम्मीद जगी कि वर्षों पुराना संघर्ष अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच सकता है।

 

हालांकि, इसके बाद भी अंतिम अधिसूचना जारी नहीं होने से ग्रामीणों का आंदोलन जारी है। वर्ष 2026 में भी वन अधिकार समिति और पूर्व सैनिक संगठनों ने सरकार से वन अधिकार अधिनियम के तहत राजस्व ग्राम की अधिसूचना जारी करने की मांग दोहराई है।

 

शुक्रवार की पदयात्रा में महिलाओं की उल्लेखनीय भागीदारी ने आंदोलन को नई ताकत दी। ग्रामीणों का कहना है कि बिंदुखत्ता की महिलाएं भी वर्षों से भूमि और प्रशासनिक अधिकारों की समस्या को झेलती आ रही हैं। ऐसे में अब वे अपने अधिकारों की लड़ाई में बराबर की भागीदार बनकर सामने आ रही हैं।

 

पदयात्रा में वनाधिकार संगठन के अध्यक्ष उमेश चंद्र भट्ट, समिति के अध्यक्ष अर्जुन नाथ गोस्वामी, पूर्व सैनिक संगठन सहित विभिन्न सामाजिक संगठनों के पदाधिकारी और ग्रामीण शामिल रहे। अभियान के दौरान लोगों को वनाधिकार अधिनियम और राजस्व ग्राम से जुड़े अधिकारों के प्रति भी जागरूक किया गया।

 

ग्रामीणों का कहना है कि बिंदुखत्ता की जनता अब अपने अधिकारों को लेकर पूरी तरह जागरूक और एकजुट है। शांतिपूर्ण एवं लोकतांत्रिक तरीके से राजस्व ग्राम के दर्जे की मांग को सरकार तक पहुंचाया जा रहा है।

 

सातवें दिन की पदयात्रा ने यह संदेश दिया कि बिंदुखत्ता की आवाज अब केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि घर-घर तक पहुंच रही है। दशकों से जंगल की जमीन पर मेहनत से अपनी दुनिया बसाने वाले हजारों परिवार अब अपनी जमीन और प्रशासनिक पहचान के अधिकार की अंतिम मंजिल चाहते हैं।

 

ग्रामीणों का कहना है कि बिंदुखत्ता ने जंगल से बस्ती, बस्ती से विशाल जनसमुदाय और अब जनसमुदाय से अधिकार आंदोलन तक का लंबा सफर तय किया है। अब उनकी नजर उस दिन पर है, जब वर्षों पुरानी मांग पूरी होकर बिंदुखत्ता को आधिकारिक रूप से राजस्व ग्राम का दर्जा मिलेगा।

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