IPS नीरू गर्ग और अरुण जोशी के वेतन पर हाईकोर्ट सख्त, बकाया भुगतान पर विचार करने के निर्देश…
केंद्रीय प्रतिनियुक्ति विवाद में 18 नवंबर को अगली सुनवाई, दोनों अधिकारियों की नियुक्ति और कार्यमुक्ति के आदेशों को लेकर चल रहा है मामला।
नैनीताल। उत्तराखंड के दो वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों नीरू गर्ग और अरुण मोहन जोशी की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति और बकाया वेतन से जुड़े मामले में नैनीताल हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। अदालत ने संबंधित सक्षम प्राधिकारी को दोनों अधिकारियों का बकाया वेतन जारी करने के संबंध में विचार करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 18 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है।
यह विवाद दोनों अधिकारियों को केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में प्रतिनियुक्ति पर भेजने और उत्तराखंड सरकार की ओर से उन्हें कार्यमुक्त किए जाने के फैसले से जुड़ा है। बुधवार, 28 अक्टूबर को मामले में हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष देर रात तक सुनवाई चली। पीठ में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय शामिल रहे।
मामले के अनुसार, उत्तराखंड सरकार ने 16 फरवरी 2026 को आईपीएस अधिकारी नीरू गर्ग और अरुण मोहन जोशी के नाम केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए भेजे थे। इसके बाद 5 मार्च को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 2005 बैच की आईपीएस अधिकारी नीरू गर्ग को भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) और 2006 बैच के अधिकारी अरुण मोहन जोशी को सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में उपमहानिरीक्षक (डीआईजी) के पद पर नियुक्त किया। इन नियुक्तियों के अगले दिन, 6 मार्च को उत्तराखंड सरकार ने दोनों अधिकारियों को कार्यमुक्त कर दिया था।
दोनों अधिकारियों ने केंद्रीय प्रतिनियुक्ति और कार्यमुक्ति के आदेशों को नई दिल्ली स्थित केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) की प्रधान पीठ में चुनौती दी थी। अधिकारियों का तर्क था कि उन पर पांच साल की प्रतिनियुक्ति संबंधी रोक लागू होने के बावजूद उनके नाम केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए भेजे गए। उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रक्रिया में उनकी सहमति नहीं ली गई थी।
इसके अलावा, दोनों अधिकारियों ने अपने पद को लेकर भी आपत्ति जताई। उनका कहना था कि उत्तराखंड पुलिस में पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) स्तर पर तैनात होने के बावजूद उन्हें केंद्रीय बलों में उपमहानिरीक्षक (डीआईजी) के पदों पर नियुक्त किया गया।
केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने 10 सितंबर 2026 को दोनों अधिकारियों के पक्ष में फैसला सुनाया था। अधिकरण ने प्रतिनियुक्ति और कार्यमुक्ति से संबंधित आदेशों को रद्द करते हुए दोनों अधिकारियों को उत्तराखंड कैडर में उनके संबंधित पदों पर बहाल करने तथा सेवा से जुड़े सभी देय लाभ उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। इसके बाद उत्तराखंड सरकार ने अधिकरण के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अधिकारियों की ओर से अदालत के अधिकार क्षेत्र को लेकर भी सवाल उठाया गया। उनका पक्ष था कि चूंकि केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण की प्रधान पीठ ने नई दिल्ली में फैसला सुनाया था, इसलिए उस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी जानी चाहिए।
सुनवाई के दौरान दोनों अधिकारियों को बकाया वेतन नहीं मिलने का मुद्दा भी सामने आया। इस पर हाईकोर्ट ने सक्षम प्राधिकारी को वेतन जारी करने के संबंध में विचार करने का निर्देश दिया।
अब इस मामले में अगली सुनवाई 18 नवंबर 2026 को होगी। इस सुनवाई पर दोनों अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति से जुड़े विवाद और वेतन सहित सेवा लाभों के मुद्दे को लेकर आगे की स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है।

