हाई कोर्ट में झूठ बोलना पड़ा भारी: कैंसर पीड़ित सास बताकर ट्रांसफर रुकवाने की कोशिश नाकाम…
नैनीताल। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने सरकारी पशु चिकित्सा अधिकारी के स्थानांतरण को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि न्यायालय को गुमराह करने का प्रयास किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने पाया कि याचिका में डॉक्टर ने अपनी मां को कैंसर पीड़ित सास बताकर स्थानांतरण से छूट लेने का दावा किया था, जो रिकॉर्ड में गलत साबित हुआ।
मामला सरकारी पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. छवि चौधरी के देहरादून से टिहरी स्थानांतरण से जुड़ा है। याचिका में कहा गया था कि उनकी कैंसर पीड़ित सास का उपचार चल रहा है और वह उनकी एकमात्र देखभाल करने वाली हैं। इसी आधार पर उत्तराखंड लोक सेवक वार्षिक स्थानांतरण अधिनियम, 2017 के तहत स्थानांतरण से छूट की मांग की गई थी।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि याचिका में प्रस्तुत तथ्य वास्तविकता से मेल नहीं खाते। अदालत ने कहा कि अधिनियम में दी गई राहत केवल कानून में परिभाषित परिवार के सदस्यों पर लागू होती है और याचिका में तथ्यों को भ्रामक तरीके से पेश किया गया है। इसी आधार पर याचिका खारिज कर दी गई।
इसी दिन हाई कोर्ट ने एक अन्य महत्वपूर्ण मामले में वरिष्ठ आईएफएस अधिकारी पंकज कुमार का स्थानांतरण आदेश भी निरस्त कर दिया। सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि संबंधित स्थानांतरण आदेश वापस ले लिया गया है, जिसके बाद अदालत ने याचिका का निस्तारण कर दिया।
वहीं, आजीवन कारावास की सजा पूरी कर चुके कैदियों की रिहाई के मामले में भी हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से कड़ा रुख अपनाते हुए एक सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के बावजूद पात्र कैदियों की रिहाई में देरी गंभीर विषय है। मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई को होगी।
